परम पूज्य नीम करौरी बाबा का पावन जीवन चरित
“मैं कोई गुरु नहीं हूँ। मैं तो केवल एक वृद्ध व्यक्ति हूँ जो तुमसे प्रेम करता है।”

करुणा के साक्षात अवतार
परम पूज्य श्री नीम करौरी बाबा महाराज जी (जिन्हें भक्त प्रेम से "महाराज जी" पुकारते हैं) आधुनिक भारत के सर्वोच्च सिद्ध संतों में अग्रणी हैं। एक साधारण ऊनी कम्बल ओढ़े, वे किसी भी प्रकार के आडंबर, प्रचार अथवा पंथवाद से सदा कोसों दूर रहे।
महाराज जी ने कभी कोई औपचारिक प्रवचन नहीं दिया और न ही कोई दीक्षा का कर्मकांड रचाया। उनका संदेश केवल अहैतुक, मौन और अथाह प्रेम था। उनके सानिध्य मात्र से मन के सारे संशय और विकार स्वतः शांत हो जाते थे।
जीवन के प्रमुख दिव्य प्रसंग
अकबरपुर में पावन अवतरण
उत्तर प्रदेश के अकबरपुर ग्राम में एक संपन्न और प्रतिष्ठित विप्र परिवार में बालक लक्ष्मी नारायण शर्मा के रूप में प्राकट्य। बाल्यकाल से ही सांसारिक मोह से विरक्त होकर साधु-संतों में अन्न-वस्त्र बांटना उनकी स्वाभाविक प्रवृत्ति थी।
लक्ष्मण दास के रूप में परिव्राजक साधना
सत्य की खोज में गृह त्याग कर माँ नर्मदा के पावन तटों, गुजरात और उत्तर भारत के वनों में मौन रहकर कठोर तपस्या की और बाबा लक्ष्मण दास के नाम से जाने गए।
नीब करौरी ग्राम में भूमिगत गुफा साधना
फर्रुखाबाद के नीब करौरी ग्राम में एक भूमिगत गुफा बनाकर वर्षों तक अखंड समाधि में रहे। यहीं सुप्रसिद्ध ब्रिटिश रेलगाड़ी का चमत्कार हुआ, जिसके बाद उनका नाम "नीब करौरी बाबा" अमर हो गया।
हनुमान गढ़ी व कैंची घाटी की खोज
सन् 1950 में नैनीताल की सुरम्य पहाड़ी पर हनुमान गढ़ी मंदिर की स्थापना की। 1962 में कैंची की घाटी में चबूतरा बनाकर एक दिव्य आश्रम की आधारशिला रखी।
कैंची धाम की पावन प्राण प्रतिष्ठा
15 जून 1964 को कैंची धाम में श्री हनुमान जी की प्राण प्रतिष्ठा हुई। इसी दिन से प्रतिवर्ष 15 जून को ऐतिहासिक कैंची धाम वार्षिक भंडारा आयोजित किया जाता है।
पश्चिमी साधकों का आगमन एवं वैश्विक प्रभाव
हार्वर्ड के प्रोफेसर रिचर्ड अल्पर्ट (राम दास), कृष्णा दास और लैरी ब्रिलियंट जैसे अनेक पश्चिमी साधक पहुंचे। बाबा ने उन्हें प्रेम, सेवा और राम नाम के वैश्विक प्रसार की प्रेरणा दी।
वृन्दावन धाम में महासमाधि
अनंत चतुर्दशी (11 सितम्बर 1973) को ब्रजभूमि वृन्दावन में बाबा जी ने नश्वर देह का त्याग कर महासमाधि ली। वृन्दावन स्थित उनका समाधि मंदिर आज भी जाग्रत चेतना का केंद्र है।
कम्बल की दिव्य महिमा
महाराज जी सदा एक साधारण ऊनी कम्बल ओढ़ा करते थे। भक्तों ने इस कम्बल से जुड़े अनगिनत चमत्कार देखे—युद्ध के मैदान से गोलियों को झेल लेना, भक्तों की असाध्य व्याधियों को अपने ऊपर ले लेना, और अंतर्मन की रक्षा करना। आज भी कैंची धाम एवं अन्य आश्रमों में बाबा जी को कम्बल अर्पित करना परम पुण्य माना जाता है।