नीम करौरी बाबा के अमृत वचन एवं उपदेश
महाराज जी के वे पावन सूत्र जो साधक के अंतर्मन को पवित्र कर ईश्वर प्रेम, परोपकार और शरणागति का मार्ग दिखाते हैं।
“सब से प्रेम करो, सब की सेवा करो, सब को भोजन कराओ, ईश्वर को याद रखो।”
महाराज जी के जीवन का मूल मंत्र: प्राणिमात्र से निष्काम प्रेम, दीन-दुखियों की सेवा, भूखों को अन्नदान, और प्रतिक्षण परमात्मा का स्मरण।
“अपने हृदय से कभी किसी को बाहर मत निकालो।”
सच्चे प्रेम में कोई पराया नहीं होता। क्षमा और वात्सल्य भाव से प्रत्येक जीव को अपने हृदय में स्थान दो।
“सर्वोत्तम सेवा यही है कि तुम्हारा मन सदा ईश्वर में लीन रहे।”
जब चित्त परमात्मा के ध्यान में स्थिर हो जाता है, तब मनुष्य द्वारा किया गया प्रत्येक कर्म स्वतः पवित्र और कल्याणकारी बन जाता है।
“भूखों को भोजन कराओ। निर्धनों और भूखों में ही परमात्मा के साक्षात दर्शन होते हैं।”
महाराज जी ने अन्नदान को सभी कर्मकांडों से श्रेष्ठ माना। किसी भूखे जीव को भोजन कराना ही ईश्वर की सच्ची पूजा है।
“धन पानी की तरह होना चाहिए—वह पीड़ितों के कष्ट दूर करने के लिए बहना चाहिए, एक जगह जमा नहीं होना चाहिए।”
धन संचय करने की वस्तु नहीं, बल्कि समाज के अभावग्रस्तों की सहायता के लिए दान करने का साधन है।
“मोह ही संसार का सबसे बड़ा बंधन है। अपना सब कुछ श्री हनुमान जी के चरणों में समर्पित कर दो।”
सांसारिक आसक्तियां ही समस्त दुखों की जड़ हैं। जब सब कुछ प्रभु चरणों में समर्पित कर दिया जाए, तभी परम शांति प्राप्त होती है।
“सब एक हैं। राम, कृष्ण, ईसा, अल्लाह—सत्य एक ही है, जिसे विभिन्न रूपों में पुकारा जाता है।”
महाराज जी ने कभी किसी धर्म, जाति या संप्रदाय में भेद नहीं देखा। सृष्टि का अंतिम सत्य यही है कि परमात्मा एक है।
“दुख भी ईश्वर की कृपा है—यह तुम्हारे पूर्व संचित कर्मों को जलाता है और मन को परमात्मा की ओर मोड़ता है।”
विपत्ति आत्मा को शुद्ध करती है और जीव को अहंकार से मुक्त कर ईश्वर की शरण में लाती है।