Divine Abundance1968कैंची धाम, नैनीताल2 मिनट पाठन
कैंची में दो छोटी देगचियों से हजारों श्रद्धालुओं को तृप्त करने का चमत्कार
प्रत्यक्षदर्शी संस्मरण एवं प्रमाणित लीला
“असमर्थ रसोइयों के सामने जब रात में अचानक सैकड़ों भूखे यात्री आए, तो बाबा जी ने दो छोटी देगचियों पर अपना कम्बल ढक दिया और आदेश दिया कि बिना देखे परोसते रहो। सबने छक कर खाया और भोजन बच गया।”
सन् 1968 की ग्रीष्म ऋतु में एक रात कैंची धाम में संध्या भंडारा समाप्त हो चुका था और आश्रम के भंडार गृह बंद हो चुके थे। रसोई में केवल छह-सात सेवादारों के लिए दो छोटी देगचियों में थोड़ी सी दाल और कुछ रोटियां बची थीं।
तभी रात के लगभग साढ़े नौ बजे राजस्थान और दिल्ली से आ रही तीन बसें पहाड़ी मार्ग पर खराब हो गईं और दो सौ से अधिक थके-भूखे श्रद्धालु कैंची धाम के द्वार पर आ पहुंचे। यात्रियों ने दिन भर से कुछ नहीं खाया था और वे भूखे पेट दर्शन की आस लगाए खड़े थे।
व्यवस्थापक के हाथ-पांव फूल गए। उस समय रात में इतने लोगों के लिए नया भोजन तैयार करना असंभव था। वे दौड़कर महाराज जी के पास पहुंचे—"बाबा जी! बाहर दो सौ से अधिक भूखे भक्त खड़े हैं और हमारे पास केवल एक कटोरा दाल बची है!"
महाराज जी ने डांटते हुए कहा—"मूर्ख! तू ईश्वर की कृपा को कटोरियों से नापता है? जा, मेरा कम्बल ले जा और दोनों देगचियों पर ढक दे। कम्बल हटाना मत! कपड़े के नीचे से चमचा डालकर परोसते जाओ और खबरदार, अंदर झांकना मत!"
सेवादारों ने बाबा जी का कम्बल देगची पर ढक दिया और पत्तलों में गरमा-गरम दाल परोसना शुरू किया। पचास लोगों ने खाया, सौ ने खाया, दो सौ यात्रियों ने तृप्त होकर प्रसाद ग्रहण किया। यहाँ तक कि बस चालकों और परिचालकों ने भी भरपेट भोजन किया। दाल समाप्त होने का नाम ही नहीं ले रही थी!
जब सब लोग खा चुके, तब व्यवस्थापक ने कांपते हाथों से कम्बल उठाया। देखा कि दोनों देगचियां ठीक उतनी ही भरी हुई थीं जितनी शुरू में थीं! अगले दिन सुबह भी आश्रम के सभी सेवादारों ने उसी दाल का प्रसाद ग्रहण किया।
इस लीला से जुड़ा पावन तीर्थ स्थल
आश्रम के दर्शन व समय देखेंकैंची धाम, नैनीताल
॥ सब कुछ महाराज जी की अहैतुकी कृपा से है — सब एक ॥