Divine Grace1905नीब करौरी रेलवे स्टेशन, फर्रुखाबाद, उत्तर प्रदेश2 मिनट पाठन
नीब करौरी स्टेशन पर ब्रिटिश रेलगाड़ी का रुकना और स्टेशन निर्माण
प्रत्यक्षदर्शी संस्मरण एवं प्रमाणित लीला
“जब एक अंग्रेज कंडक्टर ने युवा बाबा जी को प्रथम श्रेणी डिब्बे से नीचे उतार दिया, तो भारी-भरकम वाष्प रेलगाड़ी अपनी जगह से हिली तक नहीं, जब तक कि अधिकारियों ने क्षमा मांगकर स्टेशन निर्माण का लिखित वचन नहीं दिया।”
सन् 1900 के आरंभिक दशक की बात है। युवा साधु के वेश में बाबा जी (जिन्हें तब लक्ष्मण दास कहा जाता था) एक रेलगाड़ी के प्रथम श्रेणी के डिब्बे में सवार हुए। उनके पास सांसारिक संपत्ति के नाम पर केवल एक कम्बल और लकड़ी का डंडा था।
नीब करौरी नामक छोटे से देहाती ठहराव पर जब एक अंग्रेज टिकट निरीक्षक ने बिना टिकट के एक युवा साधु को देखा, तो उसने अत्यधिक क्रोधित होकर गाड़ी रुकवा दी और बाबा जी को डिब्बे से नीचे धक्का देकर उतार दिया। महाराज जी बिना किसी विरोध के मुस्कराए, अपने चिमटे को जमीन में गाड़ दिया और स्टेशन के एक वृक्ष की छांव में ध्यानमग्न होकर बैठ गए।
गार्ड ने सीटी बजाई, हरी झंडी दिखाई, चालक ने इंजन का भाप खोला, पर आश्चर्य! भारी-भरकम वाष्प रेलगाड़ी अपनी जगह से टस से मस नहीं हुई। पहिए जोर-जोर से फिसल रहे थे, भाप का दबाव पूरा था, परंतु गाड़ी एक इंच भी आगे नहीं बढ़ी। दूसरा शक्तिशाली इंजन भी जोड़कर देखा गया, परंतु दोनों इंजन ऐसे जमे रहे मानो पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण ने उन्हें जकड़ लिया हो।
घंटों बीत गए। भीषण दोपहरी में सैकड़ों यात्री व्याकुल होने लगे। तभी रेलवे के एक स्थानीय भारतीय कर्मचारी ने अंग्रेज अधिकारियों से कहा—"साहब! आपने साक्षात सिद्ध पुरुष का घोर अपमान किया है। जब तक आप उनसे क्षमा नहीं मांगेंगे और उन्हें ससम्मान गाड़ी में नहीं बिठाएंगे, यह गाड़ी किसी भी दशा में आगे नहीं बढ़ सकती।"
अंग्रेज अधिकारी लज्जित होकर बाबा जी के चरणों में पहुंचे और क्षमा याचना की। बाबा जी ने खिलखिलाकर हंसते हुए कहा—"मैं दो शर्तों पर ही चलूंगा: पहली, तुम इस पिछड़े गांव के गरीब ग्रामीणों के लिए यहाँ एक पक्का रेलवे स्टेशन बनाओगे ताकि उन्हें मीलों पैदल न चलना पड़े। दूसरी, आगे से कभी किसी साधु-संन्यासी का अपमान नहीं करोगे।"
अंग्रेजों ने तुरंत लिखित आश्वासन दिया। जैसे ही बाबा जी ने गाड़ी में पुनः अपना चरण रखा, गाड़ी सहज ही सीटी बजाते हुए आगे दौड़ पड़ी! ब्रिटिश सरकार ने अपने वादे अनुसार वहाँ नीब करौरी स्टेशन बनवाया, और तभी से इस तपोभूमि के नाम पर महाराज जी का नाम पूरे विश्व में "नीम करौरी बाबा" के रूप में अमर हो गया।
॥ सब कुछ महाराज जी की अहैतुकी कृपा से है — सब एक ॥