Mastery Over Nature1961कोसी नदी, अल्मोड़ा मार्ग, उत्तराखण्ड1 मिनट पाठन
उफनती पहाड़ी नदी को पार करना: जब बाबा के चरण भी नहीं भीगे
प्रत्यक्षदर्शी संस्मरण एवं प्रमाणित लीला
“कुमाऊँ में भीषण बाढ़ के दौरान जब पुल बह गया, तब महाराज जी उफनती पहाड़ी नदी के जल पर ऐसे चले मानो ठोस भूमि हो, और उनके कम्बल का एक कोना भी नहीं भीगा।”
सन् 1961 की मानसूनी बारिश के दौरान कुमाऊँ की पहाड़ियों में बादल फटने से नदियां उफान पर थीं। मटमैला पानी विशाल शिलाखंडों और पेड़ों को बहाता हुआ गरज रहा था। नदी पर बना मुख्य लकड़ी का पुल बह गया था और दोनों ओर लोग फंसे हुए थे।
महाराज जी अपने दो शिष्यों के साथ नदी तट पर पहुंचे। नदी का प्रवाह इतना विकराल था कि ऊपर खड़े ग्रामीण चिल्ला रहे थे—"बाबा पीछे हटिए! इस पानी में उतरना मौत को दावत देना है!"
महाराज जी ने मंद मुस्कान के साथ "राम, राम" का उच्चारण किया और सीधे उफनते पानी की ओर कदम बढ़ा दिए।
भक्तों ने डर के मारे आँखें बंद कर लीं। परंतु जब उन्होंने आँखें खोलीं, तो साक्षात चमत्कार देखा—महाराज जी के कदम पड़ते ही विकराल जलधारा शांत हो गई। बाबा जी पानी की सतह पर ऐसे चल रहे थे मानो किसी पक्के फर्श पर टहल रहे हों।
क्षण भर में महाराज जी नदी पार कर दूसरे तट पर पहुँच गए। आश्चर्य की बात यह थी कि उनके पैरों या कम्बल पर पानी की एक बूंद भी नहीं लगी थी, वे पूर्णतः सूखे थे! किनारे खड़े सैकड़ों ग्रामीणों ने हाथ जोड़कर "जय श्री राम" के जयकारे लगाए।
॥ सब कुछ महाराज जी की अहैतुकी कृपा से है — सब एक ॥