Omniscience1967हनुमान गढ़ी एवं कैंची धाम1 मिनट पाठन
सर्वज्ञता का प्रकटीकरण: जब बाबा ने बताई मन के तारों की गुप्त बात
प्रत्यक्षदर्शी संस्मरण एवं प्रमाणित लीला
“जब हार्वर्ड के प्रोफेसर डॉ. रिचर्ड अल्पर्ट बाबा जी से मिले, तो महाराज जी ने अल्पर्ट द्वारा पिछली रात खुले आसमान के नीचे सोची गई अपनी मृत माता की गुप्त बात बताकर उनके अहंकार को क्षण भर में नष्ट कर दिया।”
सन् 1967 में डॉ. रिचर्ड अल्पर्ट हार्वर्ड विश्वविद्यालय के एक प्रतिष्ठित प्रोफेसर और मनोवैज्ञानिक थे। वे पूरे भारत में एक ऐसे सच्चे गुरु की खोज में भटक रहे थे जो किसी सांसारिक प्रलोभन से परे हो। मन में पश्चिमी बौद्धिक अहंकार और संशय लिए वे नैनीताल की वादियों में बाबा जी के समक्ष पहुंचे।
महाराज जी ने इस लंबे, दाढ़ी वाले विदेशी प्रोफेसर को देखा और दुभाषिए के माध्यम से पूछा—"क्या तुम कल रात खुले आसमान के नीचे तारों को देख रहे थे?"
अल्पर्ट ने अचरज से सिर हिलाया।
बाबा जी ने आगे कहा—"क्या तुम कल रात अपनी माता जी के बारे में सोच रहे थे?"
अल्पर्ट के रोंगटे खड़े हो गए। वास्तव में पिछली रात वे अकेले टहलते हुए बोस्टन के अस्पताल में अपनी माँ के निधन को याद कर रहे थे।
तभी महाराज जी थोड़ा आगे झुके और वात्सल्य भरी दृष्टि से देखते हुए फुसफुसाए—"क्या उनकी मृत्यु तिल्ली (प्लीहा - Spleen) की बीमारी से हुई थी? ... स्प्लीन?"
यह सुनते ही रिचर्ड अल्पर्ट के पैरों तले जमीन खिसक गई! पूरे भारत में किसी को यह पता नहीं था कि उनकी माँ की मृत्यु किस दुर्लभ बीमारी से हुई थी। यह बात केवल उनके अंतर्मन में दबी थी।
उस एक क्षण में हार्वर्ड के प्रोफेसर का सारा बौद्धिक अहंकार रेत के महल की तरह ढह गया। अल्पर्ट को समझ आ गया कि उनके सामने कोई साधारण साधु नहीं, बल्कि साक्षात सर्वज्ञ, प्रेम का अनन्त सागर बैठा है। वे फूट-फूट कर रोने लगे। बाबा जी ने उनके सिर पर अपना पावन हाथ रखा और उन्हें नया नाम दिया—"राम दास" (ईश्वर का सेवक)। वही राम दास आगे चलकर 'बी हियर नाउ' जैसी अमर पुस्तक के लेखक बने और पश्चिमी जगत में करोड़ों लोगों को सनातन प्रेम और सेवा मार्ग से जोड़ा।
इस लीला से जुड़ा पावन तीर्थ स्थल
आश्रम के दर्शन व समय देखेंहनुमान गढ़ी एवं कैंची धाम
॥ सब कुछ महाराज जी की अहैतुकी कृपा से है — सब एक ॥