Mastery Over Nature1962इलाहाबाद-कानपुर राष्ट्रीय राजमार्ग, उत्तर प्रदेश1 मिनट पाठन
भीषण गर्मी में महाराज जी की रक्षा करने वाले दिव्य बादल का चमत्कार
प्रत्यक्षदर्शी संस्मरण एवं प्रमाणित लीला
“४५ डिग्री से अधिक की तपती धूप में खुले आसमान से एक अकेला शीतल बादल प्रकट हुआ और १०० किलोमीटर से अधिक की यात्रा में महाराज जी की गाड़ी के ठीक ऊपर छाया करता रहा।”
जून 1962 की तपती दोपहरी में उत्तर भारत की भीषण गर्मी चरम पर थी। तापमान 46 डिग्री सेल्सियस पार कर चुका था और लू के थपेड़े आग की लपटों जैसे चल रहे थे। महाराज जी को प्रयागराज (इलाहाबाद) से कानपुर की यात्रा करनी थी।
भक्तों ने बाबा जी के स्वास्थ्य की चिंता करते हुए विनती की कि यात्रा रात में की जाए, क्योंकि उस समय की पुरानी गाड़ियों में कोई एयर कंडीशनर नहीं होता था और धूप से गाड़ी का लोहा तवे की तरह तप रहा था। महाराज जी ने सहज भाव से कहा—"चलो, भगवान छाया करेंगे।"
जैसे ही गाड़ी शहर की सीमा से बाहर निकली, एक अलौकिक चमत्कार हुआ। चारों तरफ धधकते, बिना बादल के नीले आसमान में अचानक एक अकेला, सघन, शीतल मेघ खंड प्रकट हुआ। वह बादल ठीक गाड़ी के ऊपर आकर ठहर गया।
गाड़ी तेज चली तो बादल भी उसी गति से आगे बढ़ा। जब रेलवे फाटक पर गाड़ी रुकी, तो बादल भी वहीं स्थिर हो गया। खिड़कियों से ठंडी, मनभावन पर्वतीय हवा बहने लगी और गाड़ी के शीशे पर हल्की फुहारें पड़ने लगीं। बाहर आग बरस रही थी, पर गाड़ी के भीतर का वातावरण किसी पहाड़ी छांव जैसा सुखद हो गया।
लगभग सौ किलोमीटर से अधिक की यात्रा में वह बादल छत्र बनकर महाराज जी के ऊपर चलता रहा। गंतव्य पर पहुँचते ही वह बादल आकाश में विलीन हो गया। गाड़ी में बैठे भक्तों ने साक्षात देखा कि प्रकृति के पंचतत्व किस प्रकार महाराज जी की सेवा में नतमस्तक रहते थे।
॥ सब कुछ महाराज जी की अहैतुकी कृपा से है — सब एक ॥