Protection1943फतेहगढ़, उत्तर प्रदेश1 मिनट पाठन
द्वितीय विश्वयुद्ध में गोलियों को रोकने वाले दिव्य कम्बल का चमत्कार
प्रत्यक्षदर्शी संस्मरण एवं प्रमाणित लीला
“रात्रि भर बाबा जी कराहते रहे और कम्बल ओढ़े रहे। प्रातःकाल जब उन्होंने कम्बल हिलाया, तो उसमें से भारी बंदूक की गोलियां नीचे गिरीं—यूरोप के मोर्चे पर लड़ रहे एक वृद्ध भक्त का सैनिक पुत्र सकुशल बच गया था।”
द्वितीय विश्वयुद्ध के भयानक दौर की घटना है। महाराज जी के एक वृद्ध भक्त दंपति का इकलौता पुत्र सेना में था और यूरोप के मोर्चे पर लड़ रहा था। महीनों से उसका कोई पत्र नहीं आया था और मोर्चे से लगातार सैनिकों के मारे जाने की खबरें आ रही थीं।
एक शाम महाराज जी अचानक फतेहगढ़ स्थित उस वृद्ध दंपति के घर पधारे। उन्होंने अपना प्रसिद्ध ऊनी कम्बल सिर से पैर तक ओढ़ लिया और तख्त पर लेट गए। पूरी रात बाबा जी भीषण पीड़ा से कराहते रहे, मानो उनके शरीर पर तीव्र प्रहार हो रहे हों—"उफ्फ! गोलियां चल रही हैं... जलन हो रही है! वे उसे मार रहे हैं!"
दंपति रात भर उनके सिरहाने बैठकर राम नाम जपते रहे, यह सोचकर कि बाबा जी को कोई तीव्र ज्वर चढ़ गया है।
प्रातःकाल होते ही बाबा जी पूर्णतः स्वस्थ और मुस्कराते हुए उठ बैठे। उन्होंने अपने कम्बल को दंपति के सामने जोर से झटका। झटकते ही फर्श पर टन-टन की आवाज के साथ बंदूकों की भारी, चपटी सीसे की गोलियां गिरने लगीं! कम्बल पर बारूद के जलने के निशान थे, परंतु महाराज जी का शरीर पूरी तरह सुरक्षित था। बाबा जी ने कहा—"चिंता मत करो, तुम्हारा बेटा सुरक्षित है, वह शीघ्र घर आ रहा है।"
कुछ दिनों बाद उनका पुत्र सकुशल घर लौटा। उसने अपनी आपबीती सुनाई कि उसके दस्ते पर शत्रुओं ने अंधाधुंध गोलियों की बौछार कर दी थी और उसके सारे साथी मारे गए। पर उसने देखा कि जब-जब गोलियां उसकी ओर आतीं, एक भारी कम्बल का साया उसके सीने के आगे आ जाता और गोलियां टकराकर गिर जातीं। समय और तारीख का मिलान करने पर वह वही रात थी जब बाबा जी ने गोलियों को अपने कम्बल पर झेल लिया था!
॥ सब कुछ महाराज जी की अहैतुकी कृपा से है — सब एक ॥