Miracle of Love1965कैंची धाम, नैनीताल, उत्तराखण्ड1 मिनट पाठन
कैंची धाम भंडारे में नदी के जल का शुद्ध देशी घी में रूपांतरण
प्रत्यक्षदर्शी संस्मरण एवं प्रमाणित लीला
“कैंची आश्रम के एक विशाल भंडारे में जब पूरियां तलने का देशी घी समाप्त हो गया, तो बाबा जी ने नदी से कनस्तर भरकर पानी लाने का आदेश दिया। गर्म कड़ाह में पड़ते ही वह दिव्य सुवासित घी में बदल गया।”
सन् 1960 के दशक में कैंची धाम में एक विशाल भंडारे का आयोजन हुआ था। कुमाऊँ की पहाड़ियों और दूर-दराज के क्षेत्रों से हजारों श्रद्धालु उमड़ पड़े थे। रात-दिन विशाल कड़ाहों में प्रसाद तैयार किया जा रहा था।
देर रात मुख्य रसोइए ने घबराते हुए महाराज जी की कुटिया में आकर कहा—"बाबा जी! कड़ाहों में पूरियां तलने का सारा शुद्ध देशी घी समाप्त हो गया है। अभी भी सैकड़ों भक्त भूखे बैठे हैं और रात के इस पहर कहीं घी मिलना असंभव है!"
महाराज जी ने अपनी चिर-परिचित लीला में डांटते हुए कहा—"तुम लोग मुझे व्यर्थ परेशान करते हो! जाओ, नीचे बहने वाली क्षिप्रा नदी से दो कनस्तर भरकर पानी ले आओ और उसे सीधे खौलते कड़ाह में उड़ेल दो! पर ध्यान रहे, पीछे मुड़कर मत देखना!"
भक्तों ने बाबा जी की आज्ञा मानकर नदी से दो बड़े कनस्तर पानी भरकर कड़ाह में डाल दिया। उपस्थित लोगों की आँखें फटी की फटी रह गईं—कड़ाह में पानी पड़ते ही न तो छनछनाहट हुई और न ही कोई भाप का विस्फोट हुआ; बल्कि वह पानी तत्क्षण शुद्ध, सुवासित, सुनहरे देशी घी में बदल गया! पूरियां पहले से भी अधिक स्वादिष्ट और खस्ता बनने लगीं और सभी भक्तों ने तृप्त होकर प्रसाद ग्रहण किया।
अगले दिन प्रातःकाल बाबा जी ने व्यवस्थापक से कहा—"जाओ, हल्द्वानी बाजार से उत्तम देशी घी के दो नए कनस्तर खरीद लाओ और उस घी को नदी में प्रवाहित कर आओ। माँ गंगा का ऋण हम कभी बकाया नहीं रखते।" भक्तों ने ठीक वैसा ही किया और प्रकृति पर महाराज जी के इस दिव्य आधिपत्य को नमन किया।
इस लीला से जुड़ा पावन तीर्थ स्थल
आश्रम के दर्शन व समय देखेंकैंची धाम, नैनीताल, उत्तराखण्ड
॥ सब कुछ महाराज जी की अहैतुकी कृपा से है — सब एक ॥